श्री गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस कब मनाया जाता है?
इतिहास में धर्म, सिद्धांत और मानवता की रक्षा के लिए निस्वार्थ बलिदान के कारण हर साल 24 नवम्बर को सिक्खों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी की पुण्यतिथि को ‘शहीदी दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। औरंगजेब ने इस्लाम स्वीकार न करने पर दिल्ली के चांदनी चौक पर उनका सिर कलम करवा दिया था।
उनकी शहादत का यह दिन हमें उनके बलिदान, त्याग और सहनशीलता की याद दिलाता है, साथ ही जुल्म, अन्याय व अत्याचार के खिलाफ और धर्म की रक्षा के लिए डटकर मुकाबला करने की प्रेरणा देता है।
वैसे तो गुरु तेग बहादुर 24 नवंबर 1675 को शहीद हुए लेकिन कुछ इतिहासकारों के मुताबिक वे 11 नवंबर 1675 को शहीद हुए माने जाते हैं। इस साल 24 नवम्बर 2025 को धन श्री गुरु तेग बहादुर जी का 350वां शहीदी दिवस मनाया जा रहा है। इसी साल 18 अप्रैल को उनका 403वां प्रकाश पर्व मनाया गया।
गुरु तेग बहादुर जी के बारे में
सिखों के 9वें गुरु धन श्री गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 21 अप्रैल 1621 ईस्वी को अमृतसर में माता नानकी और गुरु हरगोबिंद सिंह जी (सिक्खों के छठे गुरु) के घर उनके के सबसे छोटे पुत्र के रूप में हुआ था। बचपन में उनका नाम ‘त्यागमल‘ था, और वे बचपन से ही बेहद साहसी और वीर थे।
एक बार, लगभग 14 वर्ष की उम्र में, वह करतारपुर की लड़ाई के बाद अपने पिता के साथ कीरतपुर जा रहे थे। फगवाड़ा के पास पलाही गांव में मुगल सेना ने अचानक हमला कर दिया। इस भीषण युद्ध में त्यागमल ने पिता का साथ देते हुए मुगलों को भागने पर मजबूर कर दिया। उनकी वीरता देखकर उनका नाम “तेग बहादुर” रखा गया।
सिखों के 8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी की अकाल मृत्यु के बाद 16 अप्रैल 1664 को श्री गुरु तेगबहादुर सिखों को नौवें गुरु बने।
गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान की साहसिक गाथा
गुरु तेग बहादुर की मुगल बादशाह औरंगजेब से सांघातिक विरोध की शुरुआत कश्मीरी पंडितों को लेकर हुई। कश्मीरी पंडित मुगलों द्वारा जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन (हिन्दू से मुस्लिम बनाए जाने) के जुल्म सह रहे थे। सैकड़ों कश्मीरी पंडितों का जत्था पंडित कृपा राम के साथ आनंदपुर साहिब पहुँचा और गुरु तेग बहादुर से अपनी रक्षा की गुहार लगाई।
गुरु तेग बहादुर जी ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को बलिदान देना होगा जिसके बलिदान से लोगों की आत्मा जाग जाएं, क्योंकि तभी गुलामी और भय से ग्रस्त ये लोग जाग सकेंगे और अपनी कायरता और डर को भुलाकर अपने धर्म की रक्षा के लिए हँसते-हँसते मौत को गले लगा सकेंगे।
औरंगजेब के हिन्दूओं पर किए जा रहे अत्याचारों और अपने पिता की बात सुन गुरु जी के नौ वर्षीय पुत्र (गुरु गोविंदसिंह) ने कहा कि उनकी नज़र में इस काम के लिए आपसे बेहतर कोई और नहीं हो सकता।
गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों पर धर्म परिवर्तन के लिए हो रहे औरंगजेब के जुल्मों और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान देने का निर्णय लिया। और औरंगजेब तक यह संदेशा पहुंचाने हो कहा कि यदि गुरु तेगबहादुर जी इस्लाम कबूल लेंगे तो वे सब भी इस्लाम स्वीकार लेंगे।
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क्यों कहलाते हैं ये ‘हिंद दी चादर’
जुलाई 1675 में गुरु तेग बहादुर अपने तीन अन्य शिष्यों के साथ अपने हत्यारे के पास स्वंय चलकर पहुंचे। इतिहासकारों की माने तो गुरु तेग बहादुर को औरंगजेब की फौज ने गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उन्हें करीब तीन-चार महीने तक कैद कर रखा गया और बाद में पिंजड़े में बंद कर 04 नवंबर 1675 को मुगल सल्तनत की राजधानी दिल्ली लाया गया।
औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर से इस्लाम स्वीकार करने को कहा, तो गुरु साहब ने जवाब दिया:
सीस कटा सकते है केश नहीं।
उन्हें डराने के लिए उनके साथ गिरफ्तार किए गए भाई मति दास के शरीर को आरे से जिन्दा चीर दिया गया, भाई दयाल दास को खौलते हुए पानी में उबाल दिया गया और भाई सति दास को कपास में लपेटकर जिंदा जलवा दिया गया।
इसके बावजूद उन्होंने जब इस्लाम स्वीकार नहीं किया तो आठ दिनों तक यातनाएं देने के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक पर भीड़ के सामने गुरु तेग बहादुर जी का सर कटवा दिया था।
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दिल्ली में कौन सा स्थान गुरु तेग बहादुर के बलिदान से जुड़ा है?
हिंदू धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेगबहादुर जी ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था, दिल्ली में 24 नवंबर 1675 को लाल किले के सामने जिस चाँदनीं चौक पर उन्हें औरंगजेब ने शहीद कराया उसी स्थान पर आज सिक्ख धर्म की आस्था से जुड़ा ‘गुरुद्वारा शीश गंज साहिब‘ स्थित है। इसके आलावा गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उस स्थान की याद दिलाता हैं जहाँ गुरुजी का अन्तिम संस्कार किया गया।
गुरु तेग बहादुर की मृत्यु कब और कैसे हुई?
उनकी मृत्यु 24 नवंबर 1675 को औरंगजेब के आदेश पर उनका सिर कलम किए जाने से हुई, उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। गुरुजी हमेशा से ही कश्मीरी हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कर जबरन उन्हें मुस्लिम बनाने के खिलाफ थे और स्वयं भी इस्लाम कबूलने से इनकार कर दिया था।
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डिस्क्लेमर: यहाँ उपलब्ध जानकारियाँ समान्य मान्यताओं और इतिहास पर आधारित है, HaxiTrick.Com इसकी पुष्टि नहीं करता।
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